सोमवार, 9 नवंबर 2009

पूर्णिमा की रात और वह आदमी

दिन भर
सातों घोड़ों को
-थकाता रहा गुस्साया सूरज
और,
जाते-जाते
छोड़ गया गर्द भरी तपती साँझ

पूरब की कोख से
जन्मना ही था भरे-पूरे चाँद को
वह भी उगा मटमैला
निकला हो जैसे गरम-गरम राख में से

उफ,
कितना सहा दिन को
फिर यह-
बेचैनी उगलती पूर्णिमा की रात!
बिजली गुल
छतों पर राहत तलाषते असुविधा की दुविधा में फँसे लोग

इस सबसे बेखबर
ठर्रे के असर में
तंगे खाता वह अधेड़
धूप की तरह पारदर्षी जिसकी पहचान
घर-परिवार सम्भालने के लिए
घर-परिवार छोड़कर
गाँव से आया कोई मजदूर या किसान

लगा,
जैसे पहली बार उसने दारू पी
खाली पेट में भभकता गुस्सा
बड़बडा़हटनुमा उसी की लपटें
बेकाबू लपटों को राह दिखाती-
फौस गालियाँ.....
श्.....देख लूँगा हरामियों को.....श्
-कहते हुए
उसके पाँव लड़खड़ाए
वह गिरा-गिरा बचा

बेखबर था छतों पर जमा लोगों से
बहुत कम वाकिफ होगा यहाँ की सड़कों से भी
(वैसे,
उसने खूब देखा था
अपने गाँव का आसमान और उसकी जमीन)

उधर,
छतों पर
केवल बिजली की वजह से
परेषान लोग
देख रहे थे उसे बड़े ही कौतुक से
-मजाकिया लहजों मंे टीका-टिप्पणी करते
और
जब वह लड़खड़ाकर गिरा होता
तब तो खूब ही हँसे थे लोग
शायद,
उस तक भी
पहुँची हों अट्टहास की कुछ तरंगें

पर,
वह बेपरवाह इंसान
बढ़ता ही गया
उस सड़क से
आगे की सड़कों की ओर
सड़कों पर उतरने का
संकल्प लेता हुआ.....

कोई टिप्पणी नहीं: